स्मार्ट गैजेट्स का क्लाउड धोखा: जब इंटरनेट आउटेज के कारण भूखे सोए पालतू जानवर

स्मार्ट गैजेट्स का क्लाउड धोखा: जब इंटरनेट आउटेज के कारण भूखे सोए पालतू जानवर · Avonetics
आधुनिक तकनीक ने हमारे घरों को 'स्मार्ट' बनाने का वादा किया था। ऐप के एक टच पर कमरे की लाइट जल जाती है, कॉफी बन जाती है और यहाँ तक कि हमारे पालतू जानवरों को वक्त पर खाना भी मिल जाता है। लेकिन क्या हो जब यह पूरी 'स्मार्ट' व्यवस्था सिर्फ एक इंटरनेट सर्वर डाउन होने से ताश के पत्तों की तरह ढह जाए?
हाल ही में एक नामी स्मार्ट पैट फीडर कंपनी के क्लाउड सर्वर में आई तकनीकी खराबी ने इस कड़वे सच को उजागर कर दिया। सर्वर क्रैश होते ही दुनिया भर के सैकड़ों स्मार्ट फीडर ऑफलाइन हो गए। जिन पेट-पेरेंट्स ने अपने कुत्तों और बिल्लियों के भोजन की जिम्मेदारी इन वाई-फाई से चलने वाले डिब्बों पर छोड़ी थी, उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। कई लोग अपने घरों से दूर थे और ऐप बंद होने के कारण अपने पालतू जानवरों को भोजन देने में पूरी तरह असमर्थ हो गए।
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चौंकाने वाली बात यह रही कि कंपनियों का दावा होता है कि इन डिवाइसों में लोकल मेमोरी होती है, जिससे इंटरनेट न होने पर भी शेड्यूल के मुताबिक खाना गिरना चाहिए। लेकिन धरातल पर कई यूजर्स ने शिकायत की कि उनके डिवाइस पूरी तरह ठप हो गए या फिर लगातार खाना गिराते रहे जब तक कि उनका प्लग नहीं निकाला गया।
इस घटना ने टेक बिरादरी में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एक उपभोक्ता ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, 'मुझे यह समझ नहीं आता कि बिल्ली के कटोरे में चार दाने गिराने के लिए किसी मशीन को वाई-फाई और क्लाउड सर्वर से जुड़ने की क्या जरूरत है? यह स्मार्ट तकनीक नहीं, बल्कि ओवर-इंजीनियरिंग का बेतुका नमूना है।'
वहीं दूसरी तरफ, कुछ लोगों का मानना है कि समस्या स्मार्ट डिवाइसेज में नहीं बल्कि उनके घटिया सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर में है। एक टेक एक्सपर्ट का कहना था, 'स्मार्ट फीचर्स जैसे कि भोजन का समय ट्रैक करना या रिमोट से फीड करना बहुत काम के हैं। लेकिन डेवलपर्स को लोकल-फर्स्ट मॉडल पर काम करना चाहिए, ताकि सर्वर डाउन होने पर भी मशीन का मुख्य काम प्रभावित न हो।'
इस आउटेज ने टेक जगत में इस्तेमाल होने वाले भारी-भरकम जार्गन और शब्दावली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्राहक अब 'क्लाउड-कनेक्टेड', 'IoT' और 'एआई-पावर्ड' जैसे शब्दों से थक चुके हैं। जब एक ₹10,000 का स्मार्ट फीडर बिना इंटरनेट के एक बिल्ली को खाना नहीं दे सकता, तो आम उपभोक्ता के लिए इन फैंसी शब्दों की कीमत शून्य हो जाती है।
क्या हम सुविधा के नाम पर अपनी स्वतंत्रता खो रहे हैं? क्या पारंपरिक और सादे गैजेट्स ही बेहतर थे? फुल चार्ज के इस एपिसोड में हमारे होस्ट्स श्वेता और सचिन ने इस पूरे टेक ड्रामे और शब्दावली के जाल पर बेहद तीखी और मजेदार बहस की है।
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